
माँ पर शेर
दो मात्राओं की बाहों में एक इकलौता अक्षर है,
यह अल्फ़ाज़ कुछ और नहीं, बस दूजा रूप ईश्वर है।
नमक पर शेर
नमक बहुतों के लिए दिल-ओ-जान होता है,
कोई ज़ख्मो से भी पूछ के देखे, नमक क्या होता है ।
जुबां पर शेर
अच्छी जुबां का एक ही असूल,
ज़रूरत से ज़्यादा न कांटे, न फूल ।
नसीब पर शेर
एक कदम पर खुशियाँ हैं, पर होतीं नहीं नसीब,
बगल में है नदिया, प्यासे को पानी नहीं नसीब,
नसीब न दे इजाज़त, तो कोई सुख नहीं सकता भोग,
प्याला छूट जाए आकर भी होठों के करीब ।
रचयिता-
सलोनी चावला।